लेखकीय

  यह सर्वविदित है कि सरकार के आदेषानुसार सरकारी कर्मचारियों को सौंपे गए सभी कार्य कानून की भाषा से ही प्रारम्भ होते हैं। कर्मचारीगण कानून के भय से सतत् प्रगतिषील रहते हुए इच्छा-अनिच्छा के सम्मिश्रण, सरकारी सुविधाएं और व्यक्तिगत विवषताओं के झूले में झूलते हुए परिस्थितियों से कदम-कदम पर समझौता-वार्ताएं करते हुए आगे बढ़ते हुए समापन स्थल अर्थात् तयषुदा मंजिल पर षत प्रतिषत पहुंच ही जाते हैं। 

    पुस्तक ‘जनगणना शतक’ में 100 से अधिक रचनाएं ‘कुण्डली’ काव्य में रची गई है। कुण्डली काव्य में 6 पंक्तियों के 12 चरणों में कुल 144 मात्राएं होती हैं। यह छंद, एक दोहा और दो रोले के सम्मिश्रण से निर्मित होता है। अंग्रेजी षब्द संख्यावाचक षब्द एवं कुछ विभागीय तकनीकी शब्दों का हू-ब-हू बार-बार प्रयोग करने की विवषता से काव्य की प्रभावोत्पादकता पर कुछ तो प्रभाव पड़ता ही ह,ै लेकिन फिर भी मेरी हास्य षैली होने से जहां-जहां भी लगा कि कविताओं एवं व्याख्याओं द्वारा राष्ट्रीय चिन्तन के महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं को काव्य, व्यंग्य, हास्य, जीवन-दर्षन द्वारा और अधिक रोचक बोधगम्य एवं चिरस्मरणीय बनाया जाना सम्भव लगा वहां हर सम्भव प्रयास किया।
   प्रत्येक 10 वर्ष में होने वाली भारतीय जनगणना की यह समृद्धषाली परम्परा वर्ष 1881 में प्रारम्भ हुई थी। भारत की जनगणना वर्ष 1872 के पष्चात् इस श्रृखंला की 15 वीं और स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद 7 वीं जनगणना है। जिसमें देष के लाखों कर्मचारी प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रुप से जुड़े हुए हैं।
    भारत की जनगणना 2011 के इस राष्ट्रीय कार्य में मुझे मास्टर ट्रेनर (दक्ष प्रषिक्षक) पद की भूमिका का निर्वहन करने का सौभाग्य मिला। मकान सूचीकरण और मकानों की गणना के लिए अनुदेष पुस्तिका का और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर परिवार अनुसूची को भरने के लिए भारत के महा रजिस्ट्रार एवं जन गणना आयुक्त का कार्यालय गृह मंत्रालय भारत सरकार नई दिल्ली द्वारा मुद्रित उक्त दोनों पुस्तकों का गहन अध्ययन किया। सृजनषीन अन्तर्मन में  विचार उठते रहे कि क्यों ना जनगणना के बिन्दुओं को सरस काव्याभिव्यक्ति दी जाए। मैं कविताओं में लगभग 20 पुस्तकों की रचना पूर्व में कर चुका हूँ। जनगणना विषय पर तो मैनंे 2001 में भी काव्य सृजन किया जिसे पाठकों ने खूब सराहा।
मेरी पुस्तक ‘जनगणना शतक’ की कविताओं का खास उद्देष्य प्रगणक, पर्यवेक्षक, उत्तर दाताओं को, किसी को भी प्रषिक्षण सम्बन्धी किसी प्रकार का कोई विषिष्ट ज्ञानार्जन कराना नहीं है वैसे भी मेरे जैसा अल्पज्ञ, इसके लिए इतना उपयुक्त भी नहीं है। मेरा मकसद तो केवल इतना सा था कि इस सरकारी सफर के दौरान प्रगणक, सुपरवाईजर इत्यादि जो-जो भी लोग इस राष्ट्रीय कार्य से जुड़े हुए हैं कार्य के दौरान उनके चेहरों पर थकान के कारण पसीने की बूंदे बार-बार छा जाया करती, मैंने काव्यानन्द की षीतल पुरवाइयों से उन्हंे सूखाने के प्रयास किया है। दोनों पुस्तकों के कुछ बिन्दु जो बौद्धिक स्तर की भिन्नता के कारण कुछ लोगांे के लिए इतने बोधगम्य नहीं हो सके जितने की अपेक्षित थे। मैंने अपनी कविताओं एवं व्याख्याओं के द्वारा उन्हें पुनः समझाने का यह छोटा सा प्रयास किया है। मैंने ‘जनगणना शतक’ पुस्तक को जनगणना कार्य में लगे लोगोें, कर्मचारियों तक ही सीमित नहीं रखना चाहा, मेरे प्रयास यह रहें कि देष की जनता, विद्यार्थी वर्ग, बुद्धिजीवी वर्ग, महिला वर्ग, उच्चस्तरीय वर्ग भी इसे रुचि लेकर पढे़ं। राष्ट्रीय उद्देष्यों को भली-भांति समझ कर लाभान्वित होंगे एवं अनुसूचियों में मुद्रित  प्रष्नों के सही उत्तर देते हुए इस कार्य की गुणवत्ता में आषातीत अभिवृद्धि कर सकेंगे।
    मैं मेरे लक्ष्य प्राप्ति में कितना सफल हो सका इसका सही मूल्यांकन तो पाठकवृन्द ही कर सकते हैं। आपके अमूल्य विचारों को जानने के लिए अपलक प्रतीरक्षारत आपका अभिन्न अनुज |
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अमृत ‘वाणी’
 (amrit'wani')