क्रमांक 22: हीरे जैसे अंक

घर-घर गए प्रगणकजी, भवन नंबर लिखाय
हीरे जैसे अंक, सब ही देय लुभाय ।।

सब ही देय लुभाय, चौदह पैंतीस सवाल
पसीना दे निकाल, याद रहे एक रूमाल ।।

कह ‘वाणी‘ कविराज, सबके घरों में जाना
मना करे यदि कोय, तो कानून दिखलाना ।।

भावार्थः
- सुन्दर हैण्ड राइटिंग वाले एक प्रगणकजी घर-घर जाकर भवन नंबर एवं जनगणना मकान नंबर लिख रहे है। इतना ही नही अनुसूचियों में भी उनकी लिखावट मनभावन है। चौदह व पैंतीस सवालों के उत्तर लिखते वक्त गर्मी व लू के कारण पसीना बहता जा रहा है। घर परिवार बाल-बच्चों सभी को भूल गये। पसीना पौछने के लिए पल-पल बचपन के साथी की तरह केवल रूमाल की बहुत यादे आ रही है।
‘वाणी‘ कविराज कहना चाहते है कि अपने ब्लॉक के एक-एक सभी घरों में जाना है। यदि कोई प्रवेष से मना करता है तो उसे मीठी वाणी में राष्ट्रीय जनगणना का महत्व समझाना है। यदि वह समझकर भी जानबुझकर नासमझ बना रहता एवं सहयोग के लिए मना करता है तब उस अल्पज्ञ एवं षडयंत्रकारी को कानून की झलक बताना आवष्यक है।

http://4.bp.blogspot.com/_q1A9TFeJdsw/S-6qQ2cEjWI/AAAAAAAAC3Y/9daenf_xjF8/s400/0210466855085.jpg

कवि :- अमृत'वाणी'